क्या तुम कोई हक़ीक़त हो या कोई सुनहरी कल्पना

मुंतज़िर मारवाड़ी

क्या तुम कोई हक़ीक़त हो या कोई सुनहरी कल्पना


ये गुलाब की महक है या तुम करीब से गुज़रीहो


ये बस एहसास है या तुम सच मे मुझ मे सामायी हो


ये मेरे बदन की गर्माहट है या सच मे तुम मेरे करीब हो


ये मेरी दीवानगी है या तुम सच मे कुछ कह रही हो


क्या तुम सच मे मेरी हो या होने का बस एक खूबसूरत धोखा



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